Gyarvi Sharif 2026: 11वीं शरीफ क्यों मनाई जाती है? जानें हजरत अब्दुल कादिर जीलानी (रह.) का जीवन, ग्यारहवीं शरीफ का महत्व, तारीख और धार्मिक परंपराएं।

Gyarvi Sharif 2026: 11th शरीफ क्यों मनाई जाती है? जानें हजरत अब्दुल कादिर जीलानी (रह.) से जुड़ी खास बातें
Gyarvi Sharif 2026: इस्लामी कैलेंडर के रबीउल आखिर महीने की 11वीं तारीख को कई सूफी परंपराओं में 11वीं शरीफ या ग्यारहवीं शरीफ के रूप में याद किया जाता है। यह दिन हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी (रह.) की याद और उनके रूहानी पैगामों से जुड़ा हुआ है। हजरत अब्दुल कादिर जीलानी (रह.) को कादरिया सूफी सिलसिले के प्रमुख संस्थापक के रूप में जाना जाता है और उनकी शिक्षाओं में इल्म, परहेजगारी, विनम्रता और नेक आचरण पर जोर मिलता है।
Gyarvi Sharif 2026 कब है?
11वीं शरीफ़ की तारीख 11 रबीउल आख़िर 1448 हिजरी से जुड़ी हुई है। 2026 में मुख़्तलिफ़ हिजरी कैलेंडर और मुक़ामी चाँद देखने की रवायत की वजह से इसकी Gregorian तारीख में फ़र्क़ नज़र आता है। कुछ कैलेंडर 22 सितंबर 2026 को 11 रबीउल आख़िर बताते हैं, जबकि हिंदुस्तान-केंद्रित कुछ कैलेंडर 24 सितंबर 2026 की तारीख देते हैं। इसलिए मुक़ामी चाँद की तस्दीक़ और मज़हबी इदारे या उलमा की तरफ़ से ऐलान की गई तारीख को तरजीह देना मुनासिब है।
Gyarvi Sharif 2026 क्या है?
Gyarvi Sharif 2026 को आम तौर पर ग्यारहवीं शरीफ़, ग्यारहवीं या Gyarvi Sharif भी कहा जाता है। यह हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) से वाबस्ता एक अहम सूफ़ियाना रवायत है।
Encyclopaedia Iranica के मुताबिक़, अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) एक मशहूर हनबली आलिम, सूफ़ी शैख़ और क़ादरिया सिलसिले के बानी थे। उनकी पैदाइश 1077–78 ईस्वी के क़रीब गीलान के इलाक़े में हुई थी। बाद में वे बग़दाद पहुंचे, जहाँ उन्होंने दीनी तालीम हासिल की और आगे चलकर एक असरदार उस्ताद और वाइज़ के तौर पर अपनी पहचान बनाई।
उनका विसाल 1166 ईस्वी में बग़दाद में हुआ। उनके उर्स की रवायती तारीख़ 11 रबीउल आख़िर बताई जाती है और इस मौक़े पर बग़दाद समेत मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर मज़हबी प्रोग्राम होते रहे हैं।
ढाई दिन का झोंपड़ा: एक ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा: 2024
हजरत अब्दुल कादिर जीलानी (रह.) कौन थे?
हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) का नाम इस्लामी सूफ़ियाना रवायत में बहुत एहतराम के साथ लिया जाता है। वे दीनी आलिम, वाइज़ और सूफ़ी शैख़ के तौर पर मशहूर हुए।
तारीख़ी मआख़िज़ के मुताबिक़, उन्होंने बग़दाद में हनबली फ़िक़्ह की तालीम हासिल की। बाद में उनकी पहचान एक असरदार उस्ताद और वाइज़ के तौर पर बनी। 12वीं सदी के दौरान उनके वाअज़ का लोगों पर काफ़ी असर पड़ा और उनके कई शागिर्द बने।
उनसे मंसूब मशहूर किताबों में Futuh al-Ghayb और al-Ghunya li-Talibi Tariq al-Haqq का ज़िक्र मिलता है।
Gyarvi Sharif 2026 में क्या किया जाता है?
Gyarvi Sharif 2026 के मौक़े पर मुख़्तलिफ़ इलाक़ों और सूफ़ियाना रवायतों में मुख़्तलिफ़ मज़हबी प्रोग्राम मुनअक़िद किए जाते हैं। इनमें आम तौर पर क़ुरआन की तिलावत, दुआ, ज़िक्र, फ़ातिहा, नात और ज़रूरतमंदों को खाना या सदक़ा देने जैसी सरगर्मियाँ शामिल हो सकती हैं।
कुछ मक़ामात पर लोग इज्तिमाई मज़हबी प्रोग्राम मुनअक़िद करते हैं और हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) की ज़िंदगी, उनकी तालीमात और उनके रूहानी पैग़ाम पर तक़रीरें भी की जाती हैं।
दावत-ए-इस्लामी की एक शाया करदा सामग्री में भी 11 रबीउल आख़िर के मौक़े पर क़ुरआन की तिलावत, इज्तिमा, नफ़्ली रोज़ा, रसाइल की तक़सीम और खाना तक़सीम करने जैसी मुख़्तलिफ़ रवायतों का ज़िक्र मिलता है।
11वीं शरीफ का पैगाम क्या है?
11वीं शरीफ़ को महज़ एक मज़हबी मौक़े के तौर पर देखने के बजाय इससे जुड़े रूहानी पैग़ाम को समझना भी अहम है।
हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) की तालीमात से मुताल्लिक़ अदबियात में दीनी पाबंदी, नेक किरदार, आजिज़ी और ख़ुद की इस्लाह जैसे मौज़ूआत नुमायाँ दिखाई देते हैं।
उनकी ज़िंदगी से जुड़ी मशहूर रवायतों में भी सच्चाई, वादा निभाने और ग़लत रास्ते से बचने पर ज़ोर दिया जाता है। हालांकि, उनसे जुड़ी तमाम मशहूर रवायतों की तारीख़ी सनद एक जैसी नहीं है। इसलिए किसी क़िस्से को बयान करते वक़्त उसे “मशहूर रवायत” या “सूफ़ियाना रवायत में मशहूर क़िस्सा” कहना ज़्यादा मुनासिब है।
सच्चाई और नेक अमल की सीख
हजरत अब्दुल कादिर जीलानी (रह.) से जुड़ा एक मशहूर क़िस्सा उनकी कम उम्र से संबंधित है। रिवायत के अनुसार, जब वे इल्म हासिल करने के लिए यात्रा पर निकले तो उनकी मां ने उन्हें हर परिस्थिति में सच बोलने की नसीहत की थी।
रास्ते में डाकुओं द्वारा काफिले को रोकने की रिवायत में बताया जाता है कि जब उनसे उनके पास मौजूद सामान के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपनी मां की नसीहत के मुताबिक सच बताया।
यह क़िस्सा सूफी परंपरा में सच्चाई और अच्छे संस्कार की ताकत के उदाहरण के रूप में सुनाया जाता है। इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना के बजाय रिवायती क़िस्से के रूप में प्रस्तुत करना उचित है।
इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि मुश्किल परिस्थिति में भी इंसान को सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए।
कादरिया सिलसिले से क्या रिश्ता है?
हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) का नाम क़ादरिया या क़ादिरी सूफ़ी सिलसिले के साथ वाबस्ता है। Encyclopaedia Iranica के मुताबिक़, उन्हें क़ादरिया सिलसिले का बानी बताया गया है। यह सूफ़ियाना रवायत बाद के दौर में मुस्लिम दुनिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों तक फैली और हिंदुस्तान समेत जुनूबी एशिया में भी इसका गहरा असर रहा।
कादरिया परंपरा से जुड़े लोगों के लिए हजरत अब्दुल कादिर जीलानी (रह.) आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सूफी परंपरा के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व माने जाते हैं।
11वीं शरीफ पर क्या पैगाम दें?
इस मौक़े पर लोगों के लिए सबसे अहम पैग़ाम अपने किरदार और ज़िंदगी में नेकी लाने का हो सकता है।
- सच बोलने की कोशिश करें।
- माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करें।
- जरूरतमंदों की मदद करें।
- गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए भोजन या अन्य सहायता करें।
- अपने व्यवहार में विनम्रता रखें।
- दूसरों के प्रति रहम और इंसानियत का भाव रखें।
- धार्मिक ज्ञान हासिल करने और नेक अमल की कोशिश करें।
11वीं शरीफ और इंसानियत
सूफ़ियाना रवायत में रूहानियत का ताल्लुक़ सिर्फ़ ज़ाती इबादत से नहीं, बल्कि इंसान के किरदार और रवैये से भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से 11वीं शरीफ़ के मौक़े पर कई मक़ामात पर खाना तक़सीम करने, ज़रूरतमंदों की मदद और इज्तिमाई मज़हबी प्रोग्राम देखने को मिलते हैं।
गोलरा शरीफ़ की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक़, वहाँ हज़रत ग़ौस-ए-आज़म सैयदना अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) का उर्स 9 से 11 रबीउस्सानी तक मनाया जाता है और इस मौक़े पर बड़ी तादाद में लोग शिरकत करते हैं।
11वीं शरीफ पर दुआ
11वीं शरीफ़ के मौक़े पर लोग अपने ख़ानदान, मुआशरे और पूरी इंसानियत के लिए अमन, सलामती और भलाई की दुआ करते हैं।
यह मौक़ा हमें अपनी ज़िंदगी में सच्चाई, नेकनीयती, आजिज़ी और दूसरों की मदद जैसे अच्छे औसाफ़ को अपनाने की याद दिला सकता है।
